राम मंदिर – एक आस्था का केन्द्र

सारांश – राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद सदियों पुराना है | राम भक्तो की आस्था अपने भगवान् राम से इस कदर जुडी हुई है जिसका विवरण 500 वर्षो के इतिहास की गलियों में मिलता है| जिसमे राम मंदिर का इतिहास , मंदिर तोड़ मस्जिद का निर्माण , विवादित मामला अदालतों में , और अंत में कोर्ट के फैसले से होकर गुजरता है |

राम मंदिर का इतिहास

राम मंदिर विवाद का इहितास

राम” नाम कोई दो अक्षर का नाम नहीं है ना ही एक मूर्ति में सीमित हो सकता है न किसी एक स्थान पर सीमित रह सकता है | राम भारत की आत्मा में बसते है, राम के बिना भारत का अस्तित्व ही नहीं है |

भगवान् राम और अयोध्या हिन्दुओ के लिए उसी तरह है जैसे हमारे मुस्लमान भाइ-बहनों के लिए मक्का – मदीना |

अयोध्या हिन्दुओ के प्राचीन धार्मिक स्थलों में से एक है | वेदों में अयोध्या को इश्वर का नगर बताया गया हैं और इसकी तुलना स्वर्ग से की गयी है | अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है |

राम मंदिर तोड़ मस्जिद का निर्माण

जैसा की सभी जानते है राम मंदिर का विवाद आज का नहीं है , बल्कि 500 वर्षो से चला आ रहा है | इस विवाद की शुरुआत 1528 ई. में हुई जब बाबर भारत पर राज करता था |

बाबर भारत में अपना नाम इतिहास के पन्नो में लिखवाना चाहता था | एक ऐसा कार्य करना चाहता था की लोग उसे सदियों तक याद रखें | इसके लिए उसने कई मंदिर तुड़वाए और मस्जिद  बनवाई, पर इससे उसे कुछ खास पहचान ना मिली, तभी उसके जनरल मीर बाकि ने 1528 में अयोध्या में स्थित राम मंदिर को पहले तो लुटा मूर्तियों को हानि पहुचाई और फिर मंदिर तुडवा कर मस्जिद का निर्माण करवाया और बाबर को भेट की, तब से ये बाबरी मस्जिद के नाम से जानी जाने लगी |

आज तक राम जन्म भूमि के लिए 76 युद्ध हुए है, इसमें कई भक्तो की, निर्दोश लोगो की जान गयी | वैसे तो राम मंदिर बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक का मामला बरसो पुराना है | 1853 में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के मामले में पहली बार हिन्दुओ और मुस्लिमो के बीच हिंसा हुई |

1853 में ये मामला ब्रिटिश सरकार के पास जा पंहुचा | ब्रिटिश सरकार के जज ने हिन्दुओ को पूजा करने की अनुमति तो दी लेकिन  मामला विवादित था | एक को पूजा करने देते और दूसरे को नहीं तो मामला और बिगड़ जाता, इसलिए ब्रिटश सरकर ने मंदिर और मस्जिद के बीच तारो की एक बाड खड़ी कर दी और विवादित भूमि के अंदर और बाहर परिसर में मुसलमानों और हिन्दुओ को अलग-अलग प्राथना करने को कहा |

राम मंदिर विवादित मामला पहली बार अदालत पहुँचा

1885 में महंत रघुवर दास ने फैजाबाद न्यायालय में एक अपील दाखिल की, जिसमे उन्होंने बताया की कैसे लोगो को मंदिर जाने में पूजा करने में परेशानी हो रही है | इसीलिए अयोध्या में मंदिर निर्माण की अनुमति चाहते है, लेकिन उनकी ये अपील फैजाबाद के सब जज पंडित हरी कृष्ण महंत ने यह कहते हुए ख़ारिज कर दी की मस्जिद के सामने मंदिर का निर्माण की अनुमति देने से हिन्दू मुस्लिम के बीच विवाद और बढेगा झगडे होंगे, खून खराबा होगा | इस फैसले के बाद बाबरी मस्जिद में नमाज़ पड़ी जाती रही और हिन्दू राम जन्म भूमि के चबूतरे पर पूजा अर्चना करते रहे |

1934 में गोवध को लेकर अयोध्या में दंगा हुआ जिसमे कई लोगो की जान गयी और बाबरी मस्जिद की एक दीवार को छति पहुँची, जिसे उस समय की सरकार ने अपने खर्चे पर बनवा दिया | 1947 को जब देश आजाद हुआ तब भी ये मामला जोरो पर था और कांग्रेस ने अपने राजनितिक फायदे के लिए बाबरी मस्जिद पर कब्ज़ा करने की योजना बनाई |

मंदिर कोर्ट और मस्जिद

1949 में एक बार फिर राम मंदिर मामला कोर्ट पहुँचा

22-23 दिसम्बर 1949 को जब सुबह मस्जिद का दरवाजा खोला गया तो वहा बाल रूप में राम लल्ला की मूर्ति पाई गई, आधी रात्रि के समय वो वहा रखी हुई मिली | इस जगह हिन्दुओ के आराध्य राम जन्म भूमि का दावा करने वाले कट्टर हिन्दू पंडितो ने कहा की राम जन्म भूमि पर राम लल्ला प्रकट हुए है, तो उन्हें यहाँ पूजा करने का अधिकार दिया जाये |

वही मुस्लिम समाज के लोग इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे, उनका कहना था की कुछ हिन्दुओ ने रात में बाबरी मस्जिद में घुस कर मूर्ति को रखा है | इस बात की सुचना सम्बंधित थाने में दी गई और अज्ञात 50 से 60 लोगो पर एफ.आइ.आर दर्ज की, मस्जिद को नापाक करने के आरोप में जेल में बंद कर दिया |

हिन्दुओ को पूजा करने की अनुमति मिलना

16 जनवरी 1950 में गोपाल दास विशारद द्वारा जिला अदालत में याचिका दायर की, कि हिन्दुओ को अपने आराध्य राम भगवान की पूजा करने और दर्शन करने की अनुमति दी जाए | एक अनुरोध किया की गर्भ गृह में रखी मूर्तियों को हटाया ना जाए और पूजा करने  की अनुमति दी जाए |

अयोध्या के सिविल जज द्वारा सुनवाई की गई, मुर्तियो को ना हटाने के साथ-साथ  उनके रख रखाव और हिन्दुओ को बंद दरवाजे के बाहर से दर्शन करने की इजाजत दी गई | मुसलमानों पर पाबन्दी भी लगा दी की वह इस विवादित मस्जिद के 300 मीटर के दायरे में ना आये |

पूजा अर्चना हिन्दुओ द्वारा जारी रखी गई | 5 दिसम्बर 1950 में रामचन्द्र परमहंस दास ने विवादित बाबरी मस्जिद में राममूर्ति रखने के लिए मुकदमा दर्ज किया, जिसमे मस्जिद को ढाँचा नाम दिया गया |

17 दिसम्बर 1959 को निर्मोही अखाड़े ने विवादित स्थल को  राममंदिर में हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया, इसके बाद मुस्लिम पक्ष की तरफ से 18 दिसम्बर 1961 को सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक़ के लिए मुकदमा दायर किया |

एक अभियान की शुरुआत

1964 में  कुछ  हिन्दुओ ने विश्व हिन्दू परिषद् के नेतृत्व में भगवन श्री राम के जन्म स्थल को मुक्त करने और मंदिर का निर्माण करवाने के लिए एक समिती का गठन किया | इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लाल कृष्ण आडवानी ने संभाला |

1984 को विशव हिन्दू परिषद् ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने, राम जन्म स्थान को स्वतंत्र करवाने के लिए और राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान शुरू किया |

अभियान जोरो शोरो से चला भी लेकिन नतीजा वही रहा, इसके बाद 1 फारवरी 1986 को उमेश चन्द्र पांडे की  याचिका पर विवादित मस्जिद का ताला खुला | हिन्दुओ को पूजा करने की  अनुमति दे दी गई, लेकिन मुस्लिम समुदाय इससे बहुत नाराज हुआ और इसका विरोध किया गया | इस विरोध संघर्ष में मुसलमानों द्वारा एक कमेटी का गठन हुआ, जिसका नाम था बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी |

11 नवम्बर 1989 में विश्व हिन्दू परिषद् ने विवादित स्थल पर गड्ढ़े खोद कर शिला पूजन किया, इसके बाद विरोध का सिलसिला चलता रहा |

1 जून 1989 में  भारतीय जनता पार्टी ने वी.एच.पी को  औपचारिक समर्थन देना शुरू किया, जिससे राम मंदिर विवाद को नया मोड़ मिला | 9 नवम्बर 1989 को राजीव गांधी सरकार ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी |

राम मंदिर के लिए निकली यात्राएं हजारों कारसेवक हुए शहीद

साल 1990 में बीजेपी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवानी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली, जिसमे बहुत से हिन्दुओ ने भाग लिया |

अक्टूबर  1990 में हजारो की संख्या में कारसेवको ने अयोध्या के लिए यात्रा निकाली, उस समय में मुलायम सिंह की सरकार थी |उनकी सरकार ने  निहत्थे कारसेवको पर गोलिया चलवा दी, इसमें बहुत से कारसेवक मारे गए पर कितने कारसेवक मारे गए यह आजतक पता नहीं चल पाया क्योंकि कई कारसेवको को वही पर जला दिया गया और दफ़न कर दिया गया |

कोठारी भाइयों का बलिदान

अक्टूबर 1990 में जब बाबरी मस्जिद के गुम्बद पे झंडा फेहराया गया तो इसमें सबसे पहला नाम कोठारी बंधुओ का आया . हमारे कारसेवक भाईयों में जो इस दौरान शहीद हुए उनमे शरद कोठारी उम्र 20  साल और राजकुमार कोठारी उम्र 23  साल  शामिल थे | अयोध्या विवादित स्थल पर  पहुचकर झंडा फेहराने के  लिए ये दोनों भाई लगभग 200 किल्लोमीटर पैदल चल कर अयोध्या पहुँचे  थे | उनकी बहन के मुताबिक बहुत ही छोटी उम्र में दोनों भाइयों ने आरएसएस जॉइन कर ली थी | देश भक्ति और समाज सेवा का जस्बा उनमे कुटकुट कर भरा था|

कल्याण सरकार की वापसी

1 अक्टूबर 1991 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार ने बाबरी मस्जिद के आसपास की 2.77 एकड़ जमींन को अपने अधिकार में ले लिया | मुस्लिम वर्ग को बहुत हैरानी हुई, उन्हें अपने हाथो से जमींन जाती नजर आने लगी |

इसके बाद कल्याण सिंह की सरकार ने इस्तीफा दिया और फिर जब दुबारा उनकी सरकार सत्ता में आई, आन्दोलन फिर से शुरू हुआ और 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को दाह कर दिया गया |

मस्जिद से पहले मंदिर का अस्तित्व

जब जमीन समतल हो गई तो कोर्ट ने जाँच के आदेश दिए कि पता लगाया जाए की मस्जिद से पहले वहां मंदिर था या नहीं ?

तब वंहा खुदाई करवाई गई, जिसमे मंदिर के होने के कई अवशेष मिले जिसमे मुर्तिया, बर्तन और कई प्रमाण मिले, जिससे यह सिद्ध होता है की वहाँ पहले एक भव्य मंदिर था | 1995 में इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने फिर से सुनवाई की और यह सुनवाई 15 सालो तक ट्रायल कोर्ट के तौर पे चली |

हाई कोर्ट का फैसला

कोर्ट द्वारा सुनवाई की गई और उसके बाद ये नतीजा दिया कि राम जन्म भूमि को तीन हिस्सों में बाँट दिया जाये, जो थे

१- एक स्थान सुननी वक्फ़ बोर्ड को मिल जाये .

२- एक स्थान निर्मोही अखाडा को मिल जाये .

३- एक भाग राम लल्ला विराजमान को दे दिया जाये .

हाई कोर्ट के इस फैसले से कोई खुश नही था और फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में गया | लगभग 15 सालो तक ऐसे ही चलता रहा, कई वकीलों के तबादले कर दिए गये, कइयो ने इस्तीफा दे दिया और वहाँ से चले गये लेकिन नतीजा वही रहा |

2010-2017 तक कोई सुनवाई नही

राम मंदिर – बाबरी मस्जिद मामला जो इतने सालो से चला आ रहा था | आन्दोलन हो रहे थे खून खराबा हो रहा था | 2010 से 2017 तक इसकी कोई सुनवाई नहीं हुई , या कहे की सुनवाई होने ही नहीं दी गई | राम मंदिर निर्माण को रोकने का हर तरह से प्रयास किया गया

कई लोग ऐसे है देश में जो चाहते ही नही थे की राम मंदिर विवाद की सुनवाई हो, मंदिर बने | 2017 में ये मामला सुप्रीम कोर्ट पंहुचा, जब इसकी सुनवाई शुरू हुई तब यह पाया गया की डाक्यूमेंट्स संस्कृत , फ़्रांस, इंग्लिश, व् हिंदी भाषाओ में थें |

योगी जी की  राम मंदिर के लिए इच्छाशक्ति

2017 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी अदित्य नाथ थे, उन्होंने महज़ 8 महीनो में 14000 डाक्यूमेंट्स का ट्रांसलेशन करवाया और वापिस सुप्रीम कोर्ट पहुचाया | जहाँ  7 सालो तक राम मंदिर विवाद केस की कोई सुनवाई नही हुई, वहीँ वर्ष 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने ये कह कर सुनवाई नही की, कि हमारे पास बहुत केस है सुनने के लिए और ये राम मंदिर विवाद केस हमारी प्राथमिकता नहीं है|

राम भक्तो के पास इंतजार करने के अलावा अब और कोई चारा नहीं था, जहाँ 400500 सालो तक इंतजार किया है वहाँ थोडा और सही |

राम मंदिर विवाद में आपसी बातचीत से  कोई हल नहीं

आखिरकार वो दिन भी आया जब सुप्रीम कोर्ट की नजर इस मामले पर पड़ी और तब सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा की ये मामला आपसी  बात-चीत से सुलझा लिया जाए, लेकिन मामला विवादित था, दो धर्मो के बीच का था | आपसी बात-चीत से  इसका हल निकलने वाला नहीं था और न ही निकला |

राम मंदिर

सुप्रीमकोर्ट का अंतिम फैसला राम मंदिर निर्माण

6 अगस्त 2019 को मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँचा | केन्द्र सरकार के दबाव के चलते अब  सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई लगातार रोजाना शुरू  कर दी | सुबह 10:30 बजे से शाम के 4:00 बजे तक सुनवाई होती रही, आखिर के 10 दिनों में इस सुनवाई को 1 घंटा ज्यादा दिया जाने लगा | लगभग 40 दिनों तक यह सुनवाई चलती रही | 16 अक्टूबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई पूरी की |

अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला 9 नवम्बर 2019 को सुना दिया, यानि विवादित ज़मीन राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण  के लिए दे दी गयी और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए अलग स्थान पर जगह देने को कहां गया |

सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में ही अलग जगह ज़मीन देने का आदेश दिया | मंदिर निर्माण के लिए कोर्ट ने केन्द्र सरकार को  3 महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया |

निष्कर्ष :- अतः अंत में यही निष्कर्ष निकलता है कि 500 वर्षो के लम्बे समय के संघर्ष और इतंजार के बाद राम भक्तो की जीत हुई | राम जन्म भूमि विवाद समाप्त हुआ और कोर्ट का फैसला राम मंदिर के हक में आया | बाबर के आने से पहले भी वहां राम मंदिर था और आज भी राम मंदिर ही बनेगा |

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6 Replies to “राम मंदिर – एक आस्था का केन्द्र”

  1. Thank u for sharing for innovative vision on ” Ram mandir” your post give me a lot of information about ram mandir .

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